जड़ चेतन गुन दोषमय, बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार॥
40+ Best Tulsidas Ke Dohe Quotes & Wishes
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Updated: October 2026
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बंदउँ संत समान चित, हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि, सम सुगंध कर दोइ॥
बिनु पद चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु करम करै बिधि नाना॥
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥
तुलसी संत सुअंब तरु, फूलि फलहिं पर हेत। इत ते वे पाहन हनत, उत ते वे फल देत॥
भक्ति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी॥
संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
सकल सुमंगल दायक, रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहीं, भव सिंधु बिना जलजान॥
तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान। भिल्लों ने लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण॥
बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥
जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥
जेहिं कर जेहिं पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलत न कछु संदेहू॥
हम चाकर रघुबीर के, पटौ लिखौ दरबार। तुलसी अब क्या होहिंगे, नर के मनसबदार॥
पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥
तुलसी भरोसे राम के, निर्भय होकर सोय। अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय॥
दीनदयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥
हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा॥
बरषत हरषत लोग सब, करषत लखै न कोइ। तुलसी प्रजा सुभाग ते, भूप भानु सो होइ॥
मुखिआ मुखु सो चाहिए, खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक॥
बिनु बिस्वास भगति नहिं, तेहिं बिनु द्रवहिं न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लह बिस्रामु॥
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥
बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥
सिय राम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥
धीरज धरम मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥
जा पर कृपा राम की होई। ता पर कृपा करै सब कोई॥
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥
बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथनि गावा॥
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाहुँ बरु बचनु न जाई॥
सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ॥
